पैतृक गांव: स्मृतियां, संघर्ष और विरासत
इस रविवार को अपने पैतृक गांव जाने का मौका मिला। व्यस्तता भरी जिंदगी में अपनी जड़ों से जुड़ी वस्तुओं को पुनः जानने और देखने का सौभाग्य एक अहम बात को उजागर करता है। यह वास्तव में हमारा भूतकालिक आईना साबित हो सकता है।
पैतृक गांव का अर्थ और पहचान
पैतृक गांव वह क्षेत्र होता है, जहां पिता का जन्म होता है और वहीं से एक पिता अपनी जिंदगी की शुरुआत करता है तथा नए जीवन का निर्माण करता है।
“लोहारों” मेरे उस गांव में अब महज दो ही आवास बचे हैं — एक हमारे हेतराम ताऊजी का और एक सागर ताऊजी का। यह कभी एक काफी बड़ा गांव हुआ करता था। काफी घर-परिवार एक साथ सामाजिक परिवेश साझा किया करते थे। वहां के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन ही था।
पूर्वजों की खोज और निजी धारणा
कृषि के लिए एक सीधी-सपाट जमीन की आवश्यकता होती है। आप यकीन मानिए, पूर्वकाल में यह क्षेत्र एक जंगली पहाड़ हुआ करता था। मेरे पूर्वज, यानी महर्षि अत्रि की कुछ संताने, जीवन-यापन के प्रवाह को बढ़ाने के लिए यहां रुकी होंगी और कड़ी मेहनत व अपने अनुवांशिक कौशल के द्वारा इस पहाड़ को सीधा एवं सपाट किया होगा। यह मेरी एक निजी धारणा रही है।
असल में, मेरे कुछ बुजुर्ग संबंधी मुझे बताते हैं कि हम पश्चिम से आए थे — मेरा मतलब पश्चिम भारत से है। कुछ बताते हैं कि वे रामगढ़ के रहने वाले थे। जीवन-यापन की राह उन्हें यहां तक ले आई थी।
सच बताऊं, इस बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं है। मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूं, परंतु पुरानी बातों को जानने के अपने गुण के कारण इतिहास प्रेमी भी बन चुका हूं।
असल बात यह है कि हम किस बात को प्राथमिकता देते हैं, यही सबसे ज्यादा मायने रखती है।
जब मनुष्य जीवन जीता है, तो उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताएं होती हैं — रोटी, कपड़ा और मकान। उस समय भी यही प्राथमिकताएं थीं। अपने जीवन का विवरण, तारीखें और जानकारी रिकॉर्ड करना कुछ ही सदियों पहले व्यवस्थित रूप से शुरू हुआ है। इसलिए बहुत सी बातें कहीं दर्ज नहीं हैं।
यही कुछ वजह हो सकती है कि मैं अपने अधिकांश अनुभवों और भावनाओं को समेटता रहता हूं, ताकि किसी भी पीढ़ी को इस बात का अचरज न रहे कि उनके पूर्वज आखिर क्या करते थे। खैर, मुझे बिल्कुल मालूम नहीं कि असल में हमारा मूल स्रोत क्या था। इस पर गहन अध्ययन की आवश्यकता पड़ेगी।
बचपन की छुट्टियां और दादी का घर
मुझे याद है, जब हम छोटे होते थे, तो छुट्टियों में हम लोहारों आया करते थे। वह दृश्य आज भी आंखों के सामने ऐसे उतरता है, जैसे आज भी हमें अपनी तरफ बुला रहा हो। गांव की रौनक, ठहाके, हंसी और मजाक — वे दिन आखिर कहां गए, मालूम नहीं पड़ता।
वहां जाना मेरे लिए किसी परियों की कहानी जैसा होता था। उस समय न तो वहां पीने के पानी की समुचित व्यवस्था होती थी और न ही आने-जाने के लिए पक्की या कच्ची सड़क। हमें कई घाटियों को पार करके आगे बढ़ना होता था।
“दादी का घर” — यही नाम था मेरी जुबान पर। दादा-दादी का प्यार भी तो वहीं मिलता था। मुझे याद है, जब हम सब वहां होते थे, तो वह एक बड़े परिवार का रूप ले लेता था। एक ही कच्ची रसोई में खाना तैयार होता था और एक ही छत के नीचे पूरा परिवार आनंद से रहता था।
सुबह उठते ही ठंडे-ठंडे मौसम के साथ पहाड़ों को देखना एक अलग ही अनुभव होता था।
पहाड़, ताई और सुबह की लस्सी
मेरे उस घर के सामने वाले पहाड़ बड़े विशाल, समृद्ध और सहनशील मालूम पड़ते थे। मेरा पहाड़ों से एक विशेष संबंध रहा है। वे मुझे बुजुर्गों की भांति हमेशा प्यार के साथ बड़ा होते देखते आ रहे हैं। कुल मिलाकर, प्रातःकाल का नजारा बड़ा ही मनोरम होता था।
मेरी ताई सुबह-सुबह दही मथती थी। उससे लस्सी बनती थी। मुझे याद आता है कि जब ताई लस्सी बना चुकी होती और मक्खन इकट्ठा करके रख चुकी होती, तो अपने हाथों की चिकनाई मेरे बालों व मुंह पर रगड़ने के लिए आती थी। यह उनका मेरे प्रति प्यार दिखाने का तरीका होता था।
मुझे सुबह इस प्रक्रिया से थोड़ा डर-सा लगता था। हालांकि, मैं ताई से कभी डरा नहीं। वह अत्यंत स्नेही व्यवहार दिखाती थीं।
दादाजी, पशु और खेती
मेरे दादाजी, जो घर के मुखिया थे, घर के जरूरी कामों के छोटे-बड़े फैसले लिया करते थे। मुझे याद है कि वह सुबह खाना खाने के बाद पशुओं को खोलकर उन्हें जंगल के ऐसे हिस्से में ले जाते थे, जहां वे घास चर सकें। मैं भी उनके साथ जाता था।
पशुओं को आगे जंगल की ओर ले जाना मेरे लिए एक रोमांचकारी सफर होता था। वैसे, कई बार घर के बाकी सदस्य भी पशुओं को चराने ले जाते थे।
वहां रास्ते नहीं थे, इसलिए आधुनिक उपकरण जैसे ट्रैक्टर या मशीनें वहां नहीं आ सकती थीं। वहां बैलों के सहारे ही खेती होती थी। यह सिलसिला आज भी जारी है। दादाजी हल चलाना जानते थे, इसलिए वही खेत जोतते थे।
मुझे याद है कि खेत जुताई, बीज बुवाई और खेत में मैल यानी खाद डालने जैसे कामों में मैं भी उनकी खासी मदद किया करता था।
शहर का बच्चा और गांव का अभ्यास
मेरा जन्म शहर में हुआ था, जबकि मेरी बड़ी बहन का जन्म यहीं हुआ था। इस वजह से दादाजी मुझे अलग दृष्टि से देखते थे। वह मुझे “बैला पानी” चढ़ने जैसे शब्दों से चिढ़ाते थे। वे चाहते थे कि मैं भौतिक अभ्यासों के साथ-साथ शारीरिक मेहनत भी करूं।
उस समय मैं बहुत खीजता था, पर एक बात सच थी — वहां जाकर मैं शारीरिक क्रियाकलाप अधिक करता था।
पानी की किल्लत और नदी का उत्सव
एक नजारे भरी बात मेरे लिए “पानी भरने वाली” जगह होती थी। कम से कम पांच सौ या छह सौ मीटर की दूरी पर पानी की लाइन थी। उसमें भी पानी राम भरोसे ही आता था। पर जब आता था, तो एक त्यौहार-सा बन जाता था।
सभी घरों की एक-एक बर्तन भरने की बारी लगती थी। मुझे याद है, मैंने भी सिर पर रखकर कई चक्कर लगाए थे। वैसे कई बार तो पानी आता ही नहीं था। तब बारी आती थी नदी की, जो पहाड़ के बिल्कुल नीचे करीब एक या डेढ़ किलोमीटर दूर थी।
पर मैं हमेशा वहां जाने की जिद करता था। नदी में मैं अत्यंत मजा करता था — पानी में उछलना, कूदना, नहाना और मस्ती करना। छोटी मछलियों को पकड़कर उन्हें छोटे सोते में डालना, फिर वापसी में नदी का पानी भरकर सिर पर रखकर घर ले जाना — यह सब मेरे लिए आनंद से भरा अनुभव था।
संघर्ष, पलायन और बदलता गांव
यह सब आज भी याद करता हूं तो खो जाता हूं। मेरे लिए यह सब मजे की बात होती थी, क्योंकि हम साल में केवल एक महीने की छोटी अवधि के लिए वहां जाया करते थे। परंतु वहां रहने वालों के लिए यह पूरा जीवन संघर्ष से भरा था — न पानी, न सड़क, और न ही बिजली।
जी हां, वहां पावर सप्लाई नहीं थी। सोलर पैनल के खंभे लगे हुए थे, वही रात को प्रकाश का स्रोत बनते थे। यह सब कोई बहुत पुरानी बात नहीं, बल्कि इसी सदी और दशक की बात है।
इन्हीं वजहों के कारण वहां के लोग नए अवसरों और सुविधाओं की तलाश में शहरों की ओर चले गए। जैसा कि मैंने बताया, उस संघर्षरत गांव में अब दो ही घर बचे हैं।
परिवार के बदलते ठिकाने
मेरे पापा बचपन में ही नीचे आ गए थे। नीचे का अर्थ शहरों से है। मेरे चाचा भी। मेरे ताऊजी के बच्चे शहरों में व्यवस्थित हैं। कड़ी मेहनत करके मेरे ताऊजी का बड़ा बेटा एक अच्छी कंपनी में नौकरी करता है और उन्हें कुछ वर्ष पहले जर्मनी जाने का भी मौका मिला था। यह हमारे परिवार के लिए गर्व की बात थी।
दादा-दादी भी अब इस दुनिया में नहीं रहे। ताऊजी को अदरंग हुआ है, इसलिए ताऊ-ताई अपने सारे पशुओं को बेचकर अपने बड़े बेटे के साथ नीचे रहने आ गए हैं।
मेरी ताई का मन सदैव पहाड़ों में ही लगा रहता है। शरीर भले कहीं और हो, परंतु उनका मन वहीं रहता है।
सुविधाएं आ गईं, लोग चले गए
अब वहां बिजली के खंभे भी लग चुके हैं, बिजली भी आ चुकी है। पानी की पाइपलाइन भी बिछ चुकी है और पानी की सप्लाई भी शुरू हो गई है। गांव को दूसरे गांव से जोड़ने के लिए कच्चे रास्ते का निर्माण भी हो चुका है।
अब वहां उतना संघर्ष नहीं बचा है। पर संघर्ष करने वाले वे लोग आखिर कहां हैं?
घर खंडहरों में तब्दील हो चुके हैं। वे मानो चीख-चीख कर उनमें रहने वालों को याद करते रहते हैं।



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